मूसलाधार बारिश में भी गूंजी छात्रों की आवाज, राहुल गांधी ने शिक्षा, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य पर किया सीधा संवाद

छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी को सुनने पहुंचे हजारों छात्र
 
   
सुमित तिवारी / उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो,
देहरादून। राजधानी देहरादून के बन्नू स्कूल मैदान में आयोजित कांग्रेस के ’’छात्रों की गूंज’’ कार्यक्रम में कांग्रेस नेता राहुल गांधी का अंदाज पूरी तरह अलग नजर आया। मूसलाधार बारिश के बीच आयोजित इस कार्यक्रम में राहुल गांधी ने राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से दूरी बनाते हुए पूरा संवाद शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर केंद्रित रखा।

कार्यक्रम की खास बात यह रही कि अपने पूरे संबोधन के दौरान राहुल गांधी ने न तो भारतीय जनता पार्टी पर हमला बोला और न ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान या मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का नाम लिया। उनका पूरा फोकस छात्रों की समस्याओं को सुनने और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर रहा।
बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में छात्र, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवा और अभिभावक कार्यक्रम में पहुंचे। मंच पर पहुंचते ही राहुल गांधी ने भाषण देने के बजाय छात्रों से सीधा संवाद करना अधिक महत्वपूर्ण समझा। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को मंच पर बुलाकर पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं और रोजगार से जुड़े अपने अनुभव साझा करने का अवसर दिया। इससे कार्यक्रम का स्वरूप पारंपरिक राजनीतिक सभा की बजाय संवाद कार्यक्रम जैसा दिखाई दिया।
 

युवाओं के सपनों व विश्वास को तोड़ती है पेपर लीक घटना
अपने संबोधन में राहुल गांधी ने कहा कि पेपर लीक जैसी घटनाएं केवल एक परीक्षा को प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि लाखों युवाओं के सपनों और व्यवस्था पर उनके विश्वास को भी तोड़ देती हैं। उन्होंने शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया और सभी युवाओं को समान अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों और आंकड़ों के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत बताई।

छात्रा के परिजनों से मुलाकात कर सुना दर्द
कार्यक्रम का सबसे भावुक क्षण तब आया जब राहुल गांधी ने नीट परीक्षा के बाद आत्महत्या करने वाली छात्रा के परिजनों से मुलाकात कर उनका दर्द सुना। उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं के बढ़ते दबाव और छात्रों के मानसिक तनाव के मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था को केवल परीक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि छात्रों के मानसिक और सामाजिक पक्ष को भी ध्यान में रखकर विकसित किया जाना चाहिए।

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