नंदा की बड़ी जात के शुरू होते ही सीमांत जनपद चमोली एक बार फिर से मां नंदा की भक्ति में डूबा
उत्तराखंड प्रहरी ब्यूरो / कमलेश पुरोहित,
चमोली। 12 साल के लंबे इंतजार के बाद वह घड़ी आई, जब मां नंदा के मायके से कैलाश के लिए डोली उठी। ढोल दमाऊं की थाप, जागरों की गूंज और जय मां नंदा के जयकारों के बीच कुरुड़ के सिद्धपीठ मंदिर से मां नंदा की बड़ी जात शुरू हुई। डोली के आगे बढ़ते ही श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। खासकर ध्याणियां मां नंदा को बेटी मानकर उनकी विदाई के समय अपने आंसू नहीं रोक सकीं। विदा करते हुए भावुक होकर मंगल गीत गाए।
सिद्धपीठ कुरुड़ से मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली, कुरुड़-दशोली की नंदा डोली और बंड क्षेत्र की नंदा डोली अपने-अपने पौराणिक यात्रा मार्गों से हिमालय की ओर रवाना हुईं। डोलियों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी यात्रा पर निकले।
लोक आस्था का सबसे बड़ा संगम मां नंदा की बड़ी जात उत्तराखंड की लोक आस्था और संस्कृति का अनूठा पर्व है। इस यात्रा में धर्म के साथ पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराएं भी जुड़ी हैं। नंदा के मायके से लेकर हिमालय तक हर पड़ाव पर लोगों की भावनाएं मां नंदा से जुड़ी रहती हैं।
डोली अब कैलाश की ओर बढ़ चली है। पीछे रह गया है मायका, ध्याणियों की नम आंखें और एक ही उम्मीद बेटी नंदा फिर लौटेंगी। मां राजराजेश्वरी की डोली पहले पड़ाव चरबंग तथा दशोली की डोली कुमजुग गांव पहुंची। जबकि बंड की डोली मैठाणा पहुंची। बों के कैलाश प्रस्थान के साथ ही प्रसिद्ध बड़ी जात नंदा मंदिर में मां नंदा पूजाओं का आयोजन किया गया।
एक बार फिर साबित कर दिया कि पहाड़ के लिए मां नंदा सिर्फ आराध्य देवी नहीं, बल्कि हर घर की बेटी हैं।
पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद मां नंदा की डोली को विधि-विधान से विदा किया गया। डोली के प्रस्थान के साथ पूरा कुरुड़ क्षेत्र जय मां नंदा के जयकारों से गूंज उठा। हजारों संख्या में श्रद्धालु यात्रा में शामिल हुए और मां के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। करीब 280 किलोमी0

जागर और लोकगीतों ने बांधा समां कुरुड़ मंदिर परिसर में मां नंदा के पौराणिक जागर और लोकगीत गूंजते रहे। ढोल-दमाऊं की थाप के साथ दांकुड़ी, झोड़ा और चांचरी की मधुर लहरियों ने पूरे वातावरण को अलौकिक बना दिया। डोली की एक झलक पाने और मां नंदा का आशीर्वाद लेने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचे। नंदा की बड़ी जात के साथ पहाड़ की लोक संस्कृति भी जीवंत हो उठी है। गांवों से लेकर डांडी-कांठी तक जागरों की गूंज सुनाई दे रही है। बुजुर्गों के साथ युवा और बच्चे भी यात्रा में शामिल होकर सदियों पुरानी परंपरा के साक्षी बन रहे
मां नंदा की विदाई का सबसे भावुक पक्ष ध्याणियों का है। जिस तरह पहाड़ की बेटी शादी के बाद अपने मायके से विदा होती है, उसी भाव के साथ नंदा को भी कैलाश के लिए विदा किया जाता है। डोली आगे बढ़ती है और पीछे मायके की आंखों में आंसू रह जाते हैं। ‘मेरी मैत की ध्याणी, तेरू बाटू हेरदू रोलु जैसे पारंपरिक गीतों में बेटी के लौटकर आने की आस और विदाई का दर्द एक साथ महसूस होता है।
लंबी यह यात्रा विभिन्न गांवों और पड़ावों से होते हुए हिमालयी क्षेत्र में पहुंचेगी। 12 वर्ष बाद आयोजित हो रही इस यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। 30 सितंबर को होमकुंड में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ यात्रा का विधिवत समापन

राजेंद्र प्रसाद ने पूजा-अर्चना संपन्न कराई। डोली की अगवानी के लिए कुंडबगढ़ और मुंग गांव से भूमियाल देवता, रामणी गांव से त्यूणा रजकोटी देवता के भक्तगण और अवतारी पुरुष मंदिर पहुंचे। नंदा बड़ी जात समिति के अध्यक्ष कर्नल(सेनि.) हरेंद्र सिंह रावत ने कहा कि वसंत पंचमी के दिन मां नंदा ने इस वर्ष कैलाश जाने की इच्छा जताई थी। मां को दिए गए वचन का निर्वहन करते हुए उन्हें पूरे मान-सम्मान के साथ कैलाश के लिए रवाना किया गया है। उन्होंने कहा कि मां की डोली ने सभी भक्तों को आशीर्वाद दिया।
इस मौके पर धराली विधायक भूपाल राम टम्टा, बदरीनाथ विधायक लखपत बुटोला,
जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत सिंह विष्ट, ब्लॉक प्रमुख हिमा देवी, मंदिर समिति अध्यक्ष सुखवीर सिंह रौतेला, बंड डोली अध्यक्ष अशोक गौड़, नगर पंचायत अध्यक्ष बीना देवी, मौजूद रही।